Tuesday, October 30, 2012

আমি কাল ..... হ্যা .... আমি তোর কাল ......

লোকে বলে রাবন আমি
   লোকে আমায় বলে অসুর
আমায় লোকে বলে কলী
    আমি হলাম যমের শশুর
 
জালাবে তুমি মোমের বাতী
   আমি তো সেই আঁধার
বিসৃন্খল বেআঈনী আমি
   নিয়ম মানি না বাঁধার
 
পোয়া সংসারে কাল আমি
   আমি স্বপ্ন দুস্খোয়ার
হাসি মুখে মিলতে এলে
   দেখাবো যমের দুয়ার
 
দীপের বাতী ভেব না আমায়
    তাপ ভরা আগুন আমি
শুভ কাজে বাঁধা দেব
   রাহু কালের  লগন আমি
 
শীতল তরল আমি তো নই
    আমি হলাম জলঝর
তুমি ভাব পোয়া আমায়
    আমি হলাম নটবর
 
আমায় ছাড়া তবু তো নেই এই জগতে কোনো মোল
   আমি ছাড়া তোর প্রভুও জলে ভাসা একটা সোল
 
চকের সাদা লেখা দেখ, কেন আমি কালো স্লেট
  মেন কোর্স টা খাবে তরিয়ে, আমি হলাম সাইড প্লেট
 
মারতে আমায় আজ আসে অবতার হয় প্রভু তোমার,
   নাত কবে যেতে ভুলে ওকে যদি না হত মোর অত্যাচার
 
ঠাকুর দেবতা স্মরণ কর মনে নিয়ে আমার ভয়,
    আমি যদি না থাকী তালে তোমার প্রভুও নয়
 
আমি পচা মাল
   আমি  বিদ্যাসাগরের রাখাল
বর্ণপরিচয়ের দ্বিতীয় অধ্যায়
    আমি অধম আমি পাতাল
 
তবুও
  
 
আমি ছাড়া হরী ...... পাবে কোন তরী ............

Sunday, July 22, 2012

पेप्सी और कोक की जवानी ( Youth engulfed in Pepsi and Coke)


It is said that the biggest power of any nation is the youth. It is the youth that builds a nation and takes it to the zenith of achievements. Youth of the nation is the hope of a change and a medium of development and the only chance that the nation and its values will be carried forward.

 Alas, in India, the youth is actually being lured by things that are killing them physically and mentally. The youth of India may be large in number but are physically drained and mentally feeble due to the cultural invasion.

This country has seen many invasions in its 5000 years of history, but a cultural invasion like this, an effort to alter our lifestyle is probably the first time that is being seen. To say the least our nation has become diabetic. It is not being alarmed of the nasty ramifications of this change of lifestyle in years to follow. My poem unveils the same.

आखिर कैसे निकलेगी नदी 
     जब दम हार चुकी पानी की रवानी .....
किस तरह काम आयेगी देश के 
    ये पेप्सी और कोक से गीली जवानी .....

बीस के कगार पर पहुँचते ही क्यों 
    कुछ कदम लड़खड़ाते है ?
रेव पार्टी के अंधेरो के बीच मुझे 
   डूबते उम्मीद नज़र आते है ......
उन अंधेरो में जागते है शाम का राजा रात की रानी 
     सर्दी और बदहजमी में सराबोर ये पेप्सी और कोक की जवानी .....

Mc Donald के बर्गर के बीच ये 
    ढूँढ़ते कुछ जीवन के राज़.....
भारत के हर युवक से क्यों आज 
    तंदुरुस्ती है नाराज़?
कैसे संभल पाएंगे ये कमज़ोर काँधे देश की धरती, देश का पानी 
     अपने ही बोझ से बदहाल ये पेप्सी और कोक की जवानी .........

लस्सी इन्हें अब कहाँ है भाते 
   चाहिए टुबोर्ग, कभी हरा कभी लाल 
नशे से होती शुरू और नशे पे ख़त्म 
     चाहे कॉलेज का खात्मा या हो नया साल 
सारे सवाल कर दरकिनार बस सोचे ये सोडा या पानी 
    नशे में धुत्त है, नकारा ये पेप्सी और कोक की जवानी 

चीज़ बूस्ट पिज्जा और सुपर सुब के लम्बे प्लेट 
      पेट इनके टंकी जैसे और दिमाग खाली स्लेट
escalator चढ़ते चढ़ते, सीढ़ी चढ़ना भूल गए 
      बिन हवा के इन लोगोके अहम् जैसे फूल गए.
हर तरफ है अफरा-तफरी, नफरत है और है ग्लानी 
     बर्बाद करके रखा देश को....ये पेप्सी और कोक की जवानी 


 Remember....... quitting all these will not only improve your health but also the health of the country.......

Wednesday, January 11, 2012

प्यार......जो नहीं था ...(Love that wasn't)

Some chases end in a mirage and some targets are really not worth achieving. After giving your heart and soul you really find that whatever was done was not worth it at all. Is it a failure of Love? Is this the point where love actually ends? Actually, does love ever end? Subjective questions have subjective answers, but the fact is that it is really important to identify love and more important to identify what is not LOVE. And when it is really identified that what it was was anything but LOVE, there is no pain and there is no remorse.





इस तरह जुदा हुए तुमसे
जैसे कभी हम मिले न थे .....
फूल चाहतो के मुरझाए ऐसे सनम
जैसे दिल में फूल कभी खिले न थे .....

मोहब्बत अगर है तो क्यों है आखिर ?
क्यों आज भी मुझे है एहसास - ए - उल्फत ?
तुमसे जंग करूं भी तो करूं कैसे आखिर
न चाहते हुए भी मुझे है तुमसे मोहब्बत .....

खामोश एहसासों के बीच कहीं तो
सुर बजता है इश्क के इज़हार का ...
इनकार के फूलो जो झाड़ते लाभों से तेरे
सिंगार करते मोहब्बत के मज़ार का ....

सलीका इश्क का मेरा कुछ रूखा है
पर बेरुखी तो तुम्हारे अंदाज़ में भी है सनम
साज़ मेरे इकरार का कुछ बेसुरा सही
बेताल तुम्हारा साज़ भी है सनम ....

कभी मिले ही नहीं तो फिर ये
जुदाई का मुझे ग़म क्यों है ??
आंसूं आँखों में कभी आये ही नहीं
तो फिर इस रुखसत में आँखें नम क्यों हैं ?

प्यार जो नहीं था इस प्यार पे क्या अफ़सोस करना ?
ज़ख्म जब है ही नहीं तो दर्द क्यों महसूस करना ?

Tuesday, January 10, 2012

कागज़ के फूल .....प्यार के (Paper Roses of Love)

Love sometimes takes a toll on your life. As they say, love may be a requirement but is not the food for life....Albeit an irritation towards love may not mean that you actually hate a person, however it means that the time has come when you require a break from love. Too much of sugar can make a dish very nauseatic and very inappropriate for consumption. So while somebody is in love, which is a very good thing, there should be moment when he/she should take a break from the process of loving. Most of the times what makes love go sour is the repetitive process of meeting and sharing thoughts. Love should be accompanied with silence.

Thus, sometimes roses of love become like that of made from paper, which have the facade but not the content.





साँसों के आने जाने पर किसीने रोक लगा दिया
तुम्हारे आहतो ने क्यों जीने पे रोक लता दिया ?

बेवक्त मुझे तुमने हर वक़्त किया परेशान
मेरे दिल के तुम बने हुए हो बिन बुलाये मेहमान ....

न चाहते हुए भी मुझे तुम्हे क्यों पड़ा चाहना
रोनी सी सूरत में भी क्यों हालात पे पड़ा हसना ?

परेशान करते हमेशा मुझे तुम्हारे लाजवाब सवाल
बेफिजूल मचा है क्यों मेरी ज़िंदगी में बवाल ?

संभालते किसको आखिर हम दिल तो हमने खो दिया,
आग की लटो में तुम्हारी हमने ज़िंदगी पिरो दिया ....

उस ज़िंदगी को मैं फिर से कहीं जीना चाहता हूँ ...
पूरा महखाना नहीं पर मह के कुछ पैमाने पीना चाहता हूँ .

पल भर के लिए ही सही पर तुम्हे चाहता हूँ मैं भूल
कब तक बहलाऊंगा दिल को देख प्यार के कागजी फूल ....

Monday, January 9, 2012

पानी हूँ मैं



तुने जो छोड़ा अधूरा है
पुराने पन्नो की वोह कहानी हूँ मैं....
सिर्फ जिस्म को ही नहीं तेरे पर
तेरे रूह को भिगोने वाला पानी हु मैं......

कभी कम्बल के पीछे से झांकती नज़रें तेरी
उन तीखे नजरो का कभी शिकार था मैं ...
कम्बल के पीछे से अभी भी चलते तीर है वोह
जिन तीरों से होता बीमार था मैं ......
रुका नहीं हूँ आज भी ....तेरे प्यार की रवानी हूँ मैं
सिर्फ जिस्म को ही नहीं तेरे पर
तेरे रूह को भिगोने वाला पानी हूँ मैं ......

सफ़ेद ओधनी की चांदनी तेरी मुझे
नहलाती थे रात भर कुछ इस तरह
की हो कितनी भी सर्दी पर फिरसे
भीगने को तैयार था मैं .......
तेरे फूल जैसे नाज़ुक हाथों के बंधन में
हर वक़्त गिरफ्तार था मैं .....
तेरे रस भरे अधरों के बीच फासी कहानी हूँ मैं
सिर्फ जिस्म को ही नहीं तेरे पर
तेरे रूह को भिगोने वाला पानी हूँ मैं

बे-फिक्र फासले.....बुलंद होसले (Careless Distances)

Can distances improve love or does love disintegrate by distances? Does any term like long distance relationship ever exist? Can two people in love be geographically separated yet be as close as they never parted? Well, questions are many but frankly speaking, if you ask me, a long distance relationship is a concept that is bull-shit. No sane person can ever take the toll of a long distance relationship. They are always built to end on a very sour note. They cause a sort of an injury that is very difficult to heal, even when you have moved on and on long long way but you tend to recall, not why it failed, but what would have been if the relationship had not been long distance.

This poem doesn't certify the invalidity of a long distance relationship concept, but merely adds a negative attribute to the same.





दूर कहीं कोई चट्टान फटे तो
आवाज़ उसकी आती हैं ....
कहीं जो गर दिल टूटे तो फिर
क्यों आवाज़ नहीं आती.....
तुम्हारे ज़िंदगी से जाने का एहसास तो है पर
ज़िंदगी क्यों तुझे याद करने से बाज़ नहीं आती?

छुपता जब है चाँद ये आसमान में तो
कहीं तो अँधेरा सा छाता हैं .....
पर यह कैसी खलिश तेरी हैं ज़िंदगी में
जो अँधेरे में रोशनी बरपाता है ???
क्यों मुझे ये इल्म नहीं के तेरा अक्स भी मेरे साथ नहीं ....
सीना आज भी मौजूद हैं पर दिल पे तेरा हाथ नहीं ......

खंजर के उतारते ही कहीं न कहीं
सुर्ख खून का बहना तो तय हैं ....
पर कैसा ये खंजर है तेरे इश्क का उतारा तुने
न बहा खून मेरा पर मरना तय हैं ....
तेरे इश्क के मीठे ज़हर ने कुछ इस तरह किया ज़हरीला
काला घाना सच भी आज मुझे लगता है रंगीला .....

तुम्हारी जुदाई हैं ये या फिर है कुछ बेफिक्र फासले .....
ठन्डे इश्क की ठंडक ने फिर बुलंद किये होसले ......

Thursday, January 5, 2012

सरफिरी हवा......और तुम्हारी जुल्फें .....




सर फिरि हवाओं ने क्यों
छेड़ा है तुम्हारे जुल्फों को ?
काले घने बादल के जैसे
लहराते ये शरारती हवाओं में .....
कुछ तो बात होगी की हर सजदे से पहले
याद आते हो तुम मुझे दुआओं में .......

दिल का हाल फिलहाल
है ठीक पर, न जाने क्यों
इस दिल को भी शायद किया हैं पागल
लहराते जुल्फों के बादल ने
कहीं संभाला तो सिर्फ संभाला उसीने
पागल हवा के आँचल ने .....

सर फिरे वो हवा जभी भी हरक़त करते हैं
न जाने क्यों हम सांस लेके भी तुम पे मरते हैं

कसूर नहीं हवाओं का पर उन लहराते जुल्फों का हैं
जिनकी वजह से हम आज भी उन सरफिरे हवाओं को याद करते हैं ......

Wednesday, January 4, 2012

बातें दिल की ......(Heart talk)




कहने भर से कोई कहाँ दिल के पास आता है
दिल का हाल तो बस एक दिल ही
दुसरे दिल को सुनाता हैं ......

पूछता है ये सवाल कई पर आखिर कहीं बोख्लाता हैं
के जवाब जो थे वो रह गए दिल में
दिल अपनी बात सुनाता हैं .....

दिल की आवाज़ को कोई रब की दरकार नहीं
प्यासा है ये एक दिलबर के नजर - ए - करम का
खुदाई से इसे सरोकार नहीं .......

बूँद के गिरने के आहात इस दिल को झंझोरती क्यों
आखिर एक पत्ते की सरसराहट इसे मरोड़ती क्यों ?
सवाल ये नहीं के क्यों इतना कमज़ोर है दिल
एक अफ़सोस के इस दिल को, करने का मज़बूत कोई औज़ार नहीं .....

नाज़ुक है दिल ये तो क्या
नज़ाक़त की क्या कोई औकाद नहीं .....
टूटते कुछ चीज़े बस यूँही
जिन्हें तोड़ने को चाहिए फौलाद नहीं ....

जंगल भले हो खामोश पर
अंदाजा खतरे का होता ज़रूर हैं
उसी तरह खामोश दिल के किसी कोने में
होता मोहब्बत का सुरूर हैं

उस दिल को जो कहीं लगी ठेस तो
बगावत बे ज़माने तो हैरत क्यों हैं ?
दिल जो चोट पहुँची वो एक दिल से ही है,
आखिर हर दिल की ये फितरत क्यों हैं ?

समेटे टूटे हुए दिल को जो फिर
वो टुकड़े फिर जुड़ते नहीं हैं ....
राह पे जो चल दिल का मुसाफिर तो फिर वो
राह से मुड़ते नहीं हैं ......

बातें दिल की हैं बहुत
पर दिल बातों से बेहेलता नहीं
के दिल की जुबां एक दिल ही जाने
बेहेलावो से वो संभालता नहीं

)