Sunday, July 16, 2017

वक़्त की चाल  .... The movement of Time....







नाराज़ है वक़्त  शायद 
तब ही तो यह करवट बदल रहा है 
तख़्त से तख्ती के सफर  के बीच 
सिसक सिसक के संभल रहा है 

सफर के आखिर में आकर ये खो बैठा मंज़िल का पता 
देखने में तो समंदर है पर फिर भी जल रहा है 
बेचाल कदम इसके पड़ते है इर्द गिर्द 
बौखलाए हुए ये बस यूँही टहल रहा है।  

गुज़र रहा है वक़्त यूँही गुज़रते गुज़रते 
है ये मुझे और मेरे शहर को निगल रहा है। 

Sunday, February 19, 2017

A story of a Lover...


This is the story of a lover who did not lose hope in love... He met a practical fate but then did not bow down.
The byproduct of Love was his MBA.... However meant nothing to him after all...


याद है मुझे वह दिन जब घर तेरे हाथ मांगने आया था
याद है मुझे वह दिन जब औकात का सबक पाया था
सैलरी स्लिप में शुन्य काम थे और प्यार कुछ ज़्यादा था
कॉर्पोरेट दुनिया का मैं मामूली प्यादा था
दफ्नाके रखा मैंने तेरे बाप के दुत्कार को
चीनी में घोल के पी गया तेरे बेवफा इनकार को
फिर तेरे ही चाहत का मेहेंगा मक़बरा बना दिया
तेरे इश्क़ में मैंने M B A कर लिया

बस गयी तू अमरीका में
तेरे ready made पति के साथ
लड़की से तू अफूस बनी और
Export हुई हाथ ओ हाथ
तेरे हर गिरगिट के रंगों से मैंने नाता जोड़ लिए
तेरे इश्क़ में मैंने M B A कर लिया

दुनियादारी का सबक यह किताब क्या सिखाते मुझे
तेरे प्यार ने तो वैसे ही दुनिया का चेरा दिखाया था
फिर भी सुनता रहा इनकी बकर को मैं दो साल
आखिर तेरे प्यार ने ही तो मुझे मिटाया था
पूल के इस पर खड़ा था अब पूल मैंने पर कर लिया
तेरे इश्क़ में मैंने M B A कर लिया।

औकात आज मेरी तेरे बाप से ज़्यादा है
उसे भी सबक सिखाने का इरादा है
पर सोचता हूँ क्यों गरीब की लुटिया डुबोऊँ
बेकार अपने हाथ गटर में धोऊ

इश्क़ था इसलिए M B A किया
फिर एक जाम उसके साथ पिया
जिसने मुझसे इश्क़ किया

आर्ट्स की पास आउट है वो ........तसवीरें बनाती है .......
ज़िंदगी को हर रोज़ नए नज़र से बताती है
फर्क उसे मेरे डिग्री का पड़ता नहीं
फर्क उसे मेरे सैलरी स्लिप का नहीं
टपरी पे चाय भी वो मेरे साथ पीती है
धीमे धीमे से कभी कोई गीत गन-गुनाती है
हीरो के हार से ज़्यादा ओस की बूंदे उसे प्यारी है
दुनिया पहले.........   बाद में दुनियादारी है

इश्क़ हुआ ऐसे की तेरी बेवफाई को माफ़ कर दिया
हां आज मैंने तुझे मेरे दिल से साफ़ कर दिया
पर अफ़सोस इस बात का फिर भी रहेगा
क्यों तेरे इश्क में M B A कर लिया



Wednesday, June 15, 2016

"Old Fashioned" हूँ पर इंसान हूँ


माना की आज e-books भी मिलते है
  पर मज़ा मुझे पन्ने पलटने में आता है
कहीं बीच में तेरा दिया वह गुलाब जो बासी है
   उसका रंग अभी भी लुभाता है। 
अभी भी तेरी याद में बेचैन हूँ। 
  "Old Fashoined" हूँ पर इंसान हूँ। 

इक़रार इ मोहब्बत करता अगर facebook पे
    तो शरारती मुसकुराहट कहाँ मैं देख पाता
ढाई इंच के कमेंट बॉक्स पे
     बस एक बेजान सा "Sticker" नज़र आता। 
बिजली के तारो के बीच कहाँ दिल के तार जुड़ते है
    यहाँ तो बस "Like" और "comment" उड़ते है। 
डर भी लगता है  मुझे के जज़्बात मेरे "Share" न हो जाए
     इस अफरा तफरी में इश्क़ बेज़ार न हो जाए।
खुद ही मैं अपना अभिमान हूँ। 
   "Old Fashioned" हूँ पर इंसान हूँ। 

आज भी मैं मेरे दोस्तों के गले मिलता हूँ
    ख़ुशी हो ग़म हो , कम सही, बांटता हूँ
समझ नहीं आयी मुझे अभी भी इन तारों की सियासत
    इसीलिए उन्हें ज़िंदा निहारता हूँ। 
उँगलियों के दबाव से बनते बिगड़ते रिश्ते
     अचानक सर झुकके टिकाते रिश्ते
उन्हें कुछ रिश्तों से मैं असावधान हूँ
   "Old Fashioned" हूँ पर इंसान हूँ। 

Saturday, May 7, 2016

Duryodhan....

I was reading the book Ajaya by the eminent author Anand Neelkatan and I realised that how contemporary the book was in today's sense. Yes the book is the Mahabharata written in the point of view of Duryodhana. However the book sends you in a mood of questioning "Could this also not have been possible". I mean look at our country how it is divided into castes and creed and sections in the society. It is quite possible that with the elimination of the Kauravas and particularly Duryodhana the fabric of caste discrimination would have been strengthened even more.
After all in the entire epic (Whichever point of view we look at it from) it was Duryodhana who rose from the thinking of a caste based society to a "Karma" or work based society. It was him who wanted to give "Eklavya" a fair chance. It was Duryodhana who fought the entire system so that you have a prominent warrior like "Karna", who finally establishes himself by his merit rather than by his birth.
It was the Pandavas who constantly tried to demean this person in some or the other way citing reasons that he was iconoclastic and was repeatedly commiting sacrilege by crossing the boundaries of the caste system.
Yes he was vanquished, but again not fair and square. Yes there was the Dice game, but he was not the only one playing it, there was somebody else also staking his kingdom, brothers, himself and his wife. He never forced him to play. The person on the other side was addicted to gambling and the proof is evident that even in the icognito period ( Agyatvaas) he decides to take up the role of a gambler (Kank) in the court of  Raja Virat.

The poem below is a short poem of my thinkings on Duryodhana.

Duryodhana coming out of the Lake for his final Battle. (Image Courtesy: Wikipedia)


नफरत से मुझे देखती है क्यों
   मेरे देश का इतिहास मुझे
गुनाह तो उस शख्स ने किया जिसने मेरा किरदार बनाया। 

मौजूद था मैं हर किसीके दुःख में सुख में
   मैं ही था वह की जो उठ सका ऊपर
      जात पात की दीवारों से
लगाव मुझे न था अपने ध्येय से पर
   प्रेम था मुझे हर परिवार से
हो अगर थोड़ा सा धीरज तो करने तो प्रयास मुझे
न देखो तुम उस किताब को  गुनाहों का जिसने सरदार बनाया। 

जब दिया किसीने गुरुदक्षिणा तब आंसूं बहे थे मेरे
   मैं ही वो था जो बना पात्र हास्य का
किसी अवतार का मैं ही तो लक्ष्य था
    विजय के बाद भी क्या कर लिया किसीने राज्य का

मेरे अधर्मो का भी है एहसास मुझे
पर हूँ तो मैं भी उसीका हिस्सा जिसने ये संसार बनाया। 


It is not always what we hear or read that is true. Remember these epics were written and documented after years of folklore passing. (Shruti and Smruti). Which means that for generations these stories were spread through word of mouth.

Now it is a well known fact that even if we hear something and it passes through several mouths and is relayed through several people there will be corruption in the information in the terms of bias and personal viewpoint. Finally if this information is documentated after 10,000 relays the information cannot be regarded as fact but "Inference" only.

While I am not saying that The Mahabharata did not happen for real. However, the possibility of Duryodhana to be so negative and Yudhishthira to be so sacrosanct is also remote.

Cheers,

Kalyan

Wednesday, May 4, 2016

Fright of truth

Andho ke bazaar me main
    Bechne chala aaeenaa
Darja awwal hai aur cheez khaalis
     Purzaa Purzaa jaise sona
Dekhe gar ruh ki Nazar se to
      Nazar lag jaaye Andho ki bhi
Us par ye bayan baazee
       Murdey bhi seekh jaaye jeena

Khauf mujhe Khuda ka hai
    Tab hi to main kehta sachchaee
Yeh baat aur hai duniyawaalo
    Duniya ko sach raas na aaee.

Be careful of your truths.

Cheers
Kalyan.

Tuesday, April 26, 2016

The reality of Eyes

हर एक आँख जो होती खामोश है, फ़साने हज़ार बयान करती है
     आँखों की हरकत है ये रूह ही जाने ये किसपे एहसान करती है

सेहर की वोह फीकी रोशनी हो
या श्याम का हल्का अँधेरा
ठहराव दोपहर का कड़ा हो
या सुबह धुप सुनहरा

हर एक पल ये अपने ही आप से कोई नया किस्सा बयान करती है
    आँखों की हरकत हाय ये रूह ही जाए ये किसपे एहसान करती है

देखती है ये तेरे बे वफाई को
सुन्न तकती है तेरी ओर
आंसूं का सैलाब बहती कभी ये
कभी सुनाती है सन्नाटे का शोर

खामोश रहती है ये पर खामोशी से क़त्ल ए आम करती है
    आँखों की हरकत हाय ये रूह ही जाए ये किसपे एहसान करती है

जब कभी भी इस ज़मीर को कोई जीन आ कचोटता है
आईना बन के तू झलकती है चेहरे के तसुर में
आँखें तो रूह का शीशा है ये दगा देती है
इंसान को हर कसूर में.

Wednesday, April 20, 2016

Kuchh Insaan Jaisa......... (Something like a human)

I have seen many people just enjoying when others are suffering or in some problem. It makes me feel that over the time have we really degraded as human beings. 

I have heard about evolution but dies evolution really lead to falling of values? Does it lead to a social cannibalization?

Thought of penning some words.


Khushi kyon dil me hai Tere
Jab kisika aashiyan ujadta hai
Yun hi ........
Kyon hothon pe muskaan Tere
Jab ghamo ka sailaab umadta hai
Yun hi.........
Sochta kabhi main hoon ki tu bhi
To rakha hoga Seene me dil
Kuchh insaan jaisa......
Kahin to hogee reham tujhme bhi
Kisika dukh hoga Teri mushkil 
Kuchh insaan jaisa......

Par bematlab hai tu Kyonki
Zamaane ke nange naach me 
Tu bhi hai shaamil 
Shayad raas nahin aayee tujhe
Sharaafat ki mehfil.