Saturday, August 12, 2017

A corpse..... Named Democracy.....

Der Friends,

How much is too much?
Lizards in meals to children dying short of breath.  Women being marauded on the streets to merit being slaughtered in the name of reservations.

Everything that Tagore and Bose ever dreamt of this country has been put to the waste bin... And today something stinks.. It is a corpse.. A corpse named Democracy.



कहते थे तुम जीजाजी अब जैल जायेंगे
कहते थे तुम पैसे खाते में चल के आयेंगे
ताले लगे नोटों पे हमने वोह भी झेल लिया
मित्रों कहके तुमने अब बहुत खेल लिया
चेले तुमहारे गाय के नाम पे देते है पीट
बेकार है लोक सभा में हर जीता सीट
आज बस तीन सालो की खुछ यादें हैं
बस तुमहारे अधुरे वादे हैं

बकर बकर सम्बित की या
चुप्पी योगीराज की
सब मिलके थोड़ा करो "प्रतीक्षा"
उपरवाले के गाज की
मैं यह कहता नहीं , पूर्वज तुमहारे कह गये
याद करो उनको अगर कभी याद आती है ....
"कुरसी खाली करो के अब जनता आती है "

खाता हूँ जब मैं टामाटर 100 रूपये किलो के
लगती है चोट बहुत कलेजे में मेरे
फिर भी शाराफत से आता हूँ पेश मैं
मिठास है अब भी लहजे में

पर अब मैं कैसे निहारूँ मासूम लाशो को
कैसे करूँ अंसुना माँ के चीखों को?
ये ना दबेगी गौ रक्षा की आड़ में
ये ना झुकेगी  अब राजनीती की पछाड़ में
भविश्य का क़तल अब होगा नहीं इस देश में
लापर्वाही ना होगी अब आरक्षण के भेस में

करने ना देंगे तुम्हे लोक तंत्र से बलातकार
मित्र मेरे....... अब हो जाओ तैयार .....

Democracy stays democracy till demography is respected. If not then no law can save it.

Friday, August 11, 2017

স্বপ্নের মৃগতৃষ্ণা  .... The Mirage of Dreams

আমরা অনেক সময় অনেক স্বপ্ন দেখি। স্বপ্ন দেখা এইটা  একটা মানুষজনীর বর বললে ভুল হবে না।  তবে অনেক এমন লোক আমি চিনি বা জানি যারা এই স্বপ্নের দিকে এমন ছুটে যায় যে তারা স্বপ্নের মৃগতৃষ্ণা দেখতে পারে না।



ছোট্ট একটা স্বপ্ন ছিল 
কেমন করে ভাঙ্গী আমি 
নিজের ছবিতে মরণ হার 
কেমন করে টাঙ্গি আমি 

একটা হাওয়া কানের পাশে 
যেন ঘুর্নী হয়ে বয়ে 
মাঝে মাঝে আমায় যেন 
কথা পুরানো কয় 

কিন্তু আমি পাগলা ঘোড়া 
স্বপ্নের  পিছু লাগাই দৌড় 
দেখিনা কোনো গলী কানা 
দেখিনা কোনো মোড় 

আপনজনেরা আবছা হলো 
বিবেক হলো ধুয়া 
আস্ত বাস্তবের কড়া পাথরে 
স্বপ্নের আলতো ছোঁয়া 

এগিয়ে যত যাই আমি স্বপ্ন দূরে সরে 
ভাগ্য আমার ঘুমিয়ে থাকে 
বলে........ এস একটু পরে 

কিন্তু আমি হার মানি না 
কারু কথা শুনি না 
আমি আমার স্বপ্নের চাকর 
আমায় কিছু বোলো না 





Friday, July 28, 2017

Rakshas.... The demon within

Many of us are unaware of the demon within that lies silent and is the biggest killer...

एक राक्षस है अंदर कहीं 
छुपा हुआ , है इंतज़ार उसे पनपने का 
मिलता है मुझे वह मेरे अंदर कभी कभी 
नहीं तो चुपके से रहता है मेरे दफ्तर के तहखानों में 
इस चूहे दौड़ के अंत में वह करता है 
मेरा इस्तक़बाल 
उगलता है कुछ तेज़ ज़हर वो 
चुपके से मेरे कानों में 

लगता हैं लोगो को ये तरक़्क़ी है पर 
खोखलापन  अंदर का कहाँ नज़र आता है 
अंदर ही अंदर मेरा राक्षस मेरे 
मन में जगह बनाता है
मेरे आस पास मेरे मेहरबानो को करता है दरकिनार 
मारता है उन्हें खंजर पीठ पर  मीठे ज़बानो से 

हर दुआ में छिपी बद्दुआ को अच्छे से ढांक देता है 
राक्षस मेरा सबके मनमे ठीक झाँक लेता है 
ये राक्षस है जो कहता है मुझको 
थोड़ा वक़्त और गुज़ारले... 
जीने के लिए वक़्त बहुत है 
आज थोड़ा सा मर ले 

Cheers...

Kalyan

Sunday, July 16, 2017

वक़्त की चाल  .... The movement of Time....







नाराज़ है वक़्त  शायद 
तब ही तो यह करवट बदल रहा है 
तख़्त से तख्ती के सफर  के बीच 
सिसक सिसक के संभल रहा है 

सफर के आखिर में आकर ये खो बैठा मंज़िल का पता 
देखने में तो समंदर है पर फिर भी जल रहा है 
बेचाल कदम इसके पड़ते है इर्द गिर्द 
बौखलाए हुए ये बस यूँही टहल रहा है।  

गुज़र रहा है वक़्त यूँही गुज़रते गुज़रते 
है ये मुझे और मेरे शहर को निगल रहा है। 

Sunday, February 19, 2017

A story of a Lover...


This is the story of a lover who did not lose hope in love... He met a practical fate but then did not bow down.
The byproduct of Love was his MBA.... However meant nothing to him after all...


याद है मुझे वह दिन जब घर तेरे हाथ मांगने आया था
याद है मुझे वह दिन जब औकात का सबक पाया था
सैलरी स्लिप में शुन्य काम थे और प्यार कुछ ज़्यादा था
कॉर्पोरेट दुनिया का मैं मामूली प्यादा था
दफ्नाके रखा मैंने तेरे बाप के दुत्कार को
चीनी में घोल के पी गया तेरे बेवफा इनकार को
फिर तेरे ही चाहत का मेहेंगा मक़बरा बना दिया
तेरे इश्क़ में मैंने M B A कर लिया

बस गयी तू अमरीका में
तेरे ready made पति के साथ
लड़की से तू अफूस बनी और
Export हुई हाथ ओ हाथ
तेरे हर गिरगिट के रंगों से मैंने नाता जोड़ लिए
तेरे इश्क़ में मैंने M B A कर लिया

दुनियादारी का सबक यह किताब क्या सिखाते मुझे
तेरे प्यार ने तो वैसे ही दुनिया का चेरा दिखाया था
फिर भी सुनता रहा इनकी बकर को मैं दो साल
आखिर तेरे प्यार ने ही तो मुझे मिटाया था
पूल के इस पर खड़ा था अब पूल मैंने पर कर लिया
तेरे इश्क़ में मैंने M B A कर लिया।

औकात आज मेरी तेरे बाप से ज़्यादा है
उसे भी सबक सिखाने का इरादा है
पर सोचता हूँ क्यों गरीब की लुटिया डुबोऊँ
बेकार अपने हाथ गटर में धोऊ

इश्क़ था इसलिए M B A किया
फिर एक जाम उसके साथ पिया
जिसने मुझसे इश्क़ किया

आर्ट्स की पास आउट है वो ........तसवीरें बनाती है .......
ज़िंदगी को हर रोज़ नए नज़र से बताती है
फर्क उसे मेरे डिग्री का पड़ता नहीं
फर्क उसे मेरे सैलरी स्लिप का नहीं
टपरी पे चाय भी वो मेरे साथ पीती है
धीमे धीमे से कभी कोई गीत गन-गुनाती है
हीरो के हार से ज़्यादा ओस की बूंदे उसे प्यारी है
दुनिया पहले.........   बाद में दुनियादारी है

इश्क़ हुआ ऐसे की तेरी बेवफाई को माफ़ कर दिया
हां आज मैंने तुझे मेरे दिल से साफ़ कर दिया
पर अफ़सोस इस बात का फिर भी रहेगा
क्यों तेरे इश्क में M B A कर लिया



Wednesday, June 15, 2016

"Old Fashioned" हूँ पर इंसान हूँ


माना की आज e-books भी मिलते है
  पर मज़ा मुझे पन्ने पलटने में आता है
कहीं बीच में तेरा दिया वह गुलाब जो बासी है
   उसका रंग अभी भी लुभाता है। 
अभी भी तेरी याद में बेचैन हूँ। 
  "Old Fashoined" हूँ पर इंसान हूँ। 

इक़रार इ मोहब्बत करता अगर facebook पे
    तो शरारती मुसकुराहट कहाँ मैं देख पाता
ढाई इंच के कमेंट बॉक्स पे
     बस एक बेजान सा "Sticker" नज़र आता। 
बिजली के तारो के बीच कहाँ दिल के तार जुड़ते है
    यहाँ तो बस "Like" और "comment" उड़ते है। 
डर भी लगता है  मुझे के जज़्बात मेरे "Share" न हो जाए
     इस अफरा तफरी में इश्क़ बेज़ार न हो जाए।
खुद ही मैं अपना अभिमान हूँ। 
   "Old Fashioned" हूँ पर इंसान हूँ। 

आज भी मैं मेरे दोस्तों के गले मिलता हूँ
    ख़ुशी हो ग़म हो , कम सही, बांटता हूँ
समझ नहीं आयी मुझे अभी भी इन तारों की सियासत
    इसीलिए उन्हें ज़िंदा निहारता हूँ। 
उँगलियों के दबाव से बनते बिगड़ते रिश्ते
     अचानक सर झुकके टिकाते रिश्ते
उन्हें कुछ रिश्तों से मैं असावधान हूँ
   "Old Fashioned" हूँ पर इंसान हूँ। 

Saturday, May 7, 2016

Duryodhan....

I was reading the book Ajaya by the eminent author Anand Neelkatan and I realised that how contemporary the book was in today's sense. Yes the book is the Mahabharata written in the point of view of Duryodhana. However the book sends you in a mood of questioning "Could this also not have been possible". I mean look at our country how it is divided into castes and creed and sections in the society. It is quite possible that with the elimination of the Kauravas and particularly Duryodhana the fabric of caste discrimination would have been strengthened even more.
After all in the entire epic (Whichever point of view we look at it from) it was Duryodhana who rose from the thinking of a caste based society to a "Karma" or work based society. It was him who wanted to give "Eklavya" a fair chance. It was Duryodhana who fought the entire system so that you have a prominent warrior like "Karna", who finally establishes himself by his merit rather than by his birth.
It was the Pandavas who constantly tried to demean this person in some or the other way citing reasons that he was iconoclastic and was repeatedly commiting sacrilege by crossing the boundaries of the caste system.
Yes he was vanquished, but again not fair and square. Yes there was the Dice game, but he was not the only one playing it, there was somebody else also staking his kingdom, brothers, himself and his wife. He never forced him to play. The person on the other side was addicted to gambling and the proof is evident that even in the icognito period ( Agyatvaas) he decides to take up the role of a gambler (Kank) in the court of  Raja Virat.

The poem below is a short poem of my thinkings on Duryodhana.

Duryodhana coming out of the Lake for his final Battle. (Image Courtesy: Wikipedia)


नफरत से मुझे देखती है क्यों
   मेरे देश का इतिहास मुझे
गुनाह तो उस शख्स ने किया जिसने मेरा किरदार बनाया। 

मौजूद था मैं हर किसीके दुःख में सुख में
   मैं ही था वह की जो उठ सका ऊपर
      जात पात की दीवारों से
लगाव मुझे न था अपने ध्येय से पर
   प्रेम था मुझे हर परिवार से
हो अगर थोड़ा सा धीरज तो करने तो प्रयास मुझे
न देखो तुम उस किताब को  गुनाहों का जिसने सरदार बनाया। 

जब दिया किसीने गुरुदक्षिणा तब आंसूं बहे थे मेरे
   मैं ही वो था जो बना पात्र हास्य का
किसी अवतार का मैं ही तो लक्ष्य था
    विजय के बाद भी क्या कर लिया किसीने राज्य का

मेरे अधर्मो का भी है एहसास मुझे
पर हूँ तो मैं भी उसीका हिस्सा जिसने ये संसार बनाया। 


It is not always what we hear or read that is true. Remember these epics were written and documented after years of folklore passing. (Shruti and Smruti). Which means that for generations these stories were spread through word of mouth.

Now it is a well known fact that even if we hear something and it passes through several mouths and is relayed through several people there will be corruption in the information in the terms of bias and personal viewpoint. Finally if this information is documentated after 10,000 relays the information cannot be regarded as fact but "Inference" only.

While I am not saying that The Mahabharata did not happen for real. However, the possibility of Duryodhana to be so negative and Yudhishthira to be so sacrosanct is also remote.

Cheers,

Kalyan