Sunday, August 13, 2017

A corpse..... Named Democracy.....

Der Friends,

How much is too much?
Lizards in meals to children dying short of breath.  Women being marauded on the streets to merit being slaughtered in the name of reservations.

Everything that Tagore and Bose ever dreamt of this country has been put to the waste bin... And today something stinks.. It is a corpse.. A corpse named Democracy.



कहते थे तुम जीजाजी अब जैल जायेंगे
कहते थे तुम पैसे खाते में चल के आयेंगे
ताले लगे नोटों पे हमने वोह भी झेल लिया
मित्रों कहके तुमने अब बहुत खेल लिया
चेले तुमहारे गाय के नाम पे देते है पीट
बेकार है लोक सभा में हर जीता सीट
आज बस तीन सालो की खुछ यादें हैं
बस तुमहारे अधुरे वादे हैं

बकर बकर सम्बित की या
चुप्पी योगीराज की
सब मिलके थोड़ा करो "प्रतीक्षा"
उपरवाले के गाज की
मैं यह कहता नहीं , पूर्वज तुमहारे कह गये
याद करो उनको अगर कभी याद आती है ....
"कुरसी खाली करो के अब जनता आती है "

खाता हूँ जब मैं टामाटर 100 रूपये किलो के
लगती है चोट बहुत कलेजे में मेरे
फिर भी शाराफत से आता हूँ पेश मैं
मिठास है अब भी लहजे में

पर अब मैं कैसे निहारूँ मासूम लाशो को
कैसे करूँ अंसुना माँ के चीखों को?
ये ना दबेगी गौ रक्षा की आड़ में
ये ना झुकेगी  अब राजनीती की पछाड़ में
भविश्य का क़तल अब होगा नहीं इस देश में
लापर्वाही ना होगी अब आरक्षण के भेस में

करने ना देंगे तुम्हे लोक तंत्र से बलातकार
मित्र मेरे....... अब हो जाओ तैयार .....

Democracy stays democracy till demography is respected. If not then no law can save it.

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